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उत्तर प्रदेश में “टू चाइल्ड पॉलिसी” चुनावी स्टंट या वक्त की मांग

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राज्य के विधि आयोग ने एक बिल का मसौदा तैयार किया है। बिल का उद्देश्य राज्य में तेजी से बढ़ रहे जनसंख्या वृध्दि को नियंत्रण करना है। मसौदे में इस बात पर सिफारिश की गई है कि दो बच्चों की नीति का उल्लंघन करने वालों को स्थानीय निकायों के चुनाव में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं देना, सरकारी नौकरी में आवेदन करने और प्रमोशन पर रोक लगाने जैसे मांग उठाना। साथ ही ये सुनिश्चित करना कि ऐसे लोगों को सरकार की ओर से मिलने वाले किसी भी लाभ से वंचित रखा जाए मौजूद है। आयोग ने ड्राफ्ट तैयार कर अपने वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। साथ ही लोगों से 19 जुलाई तक ड्राफ्ट पर अपनी राय देने को कहा गया है।
बिल के मसौदे में इस नीति पर अमल करने वालों को अतिरिक्त सुविधाए देने का भी प्रस्ताव दिया गया है।
समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया है कि मसौदे के अनुसार, “दो बच्चों के नियम का पालन करने वाले सरकारी कर्मचारियों को सेवा काल के दौरान दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि मिलेंगे। माँ या पिता बनने पर पूरे वेतन और भत्तों के साथ 12 महीने की छुट्टी मिलेगी। नेशनल पेंशन स्कीम के तहत नियोक्ता के अंशदान में तीन फ़ीसदी का इजाफ़ा होगा.”
ड्राफ्ट के अनुसार दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को सरकार के कल्याणकारी योजनाओं से भी वंचित रखा जाएगा। साथ ही कहा गया कि स्कूली पाठ्यक्रमों में जनसंख्या नियंत्रण की जागरुकता को भी अनिवार्य बनाया जाएगा. रिपोर्टो के अनुसार जो दंपत्ति सिर्फ एक बच्चे कि नीति अपनाकर नसबंदी करता है, तो सरकार उन्हे बेटे के लिए एक मुश्त 80,000 रुपये और बेटी के लिए 1,00,000 रुपये की आर्थिक मदद देगी।

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ड्राफ्ट की जरुरत
जानकारों की माने तो देश के सभी राज्यों में प्रजनन दर में कमी आयी है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में भी जनसंख्या वृध्दि दर में कमी का अंदेशा लगाया जा सकता है। पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की कार्यवाहक निदेशक पूनम मुत्तरेजा आश्चर्य जताती हैं कि लॉ कमीशन को ऐसा ड्राफ़्ट विधेयक (बिल) बनाने को क्यों कहा गया. उनके मुताबिक़ ये काम तो मूलतः स्वास्थ्य विभाग का है.
मुत्तरेजा ने कहा, “सवाल ये है कि क्या ये जनसंख्या विधेयक स्वास्थ्य से जुड़े आँकड़ों के आधार पर बनाया गया है? राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े आने वाले हैं, और अगर बिहार में फ़र्टिलिटी रेट गिर रहा है तो उत्तर प्रदेश में भी गिरने की उम्मीद है. केरल और देश के कई राज्यों को देखें तो बिना इस तरह की कठोर नीतियों और क़ानूनों के ही फ़र्टिलिटी रेट कम हो रहा है.”
उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट में भी जब दो बच्चों की नीति से जुड़ी एक पीआईएल की सुनवाई हुई, तो केंद्र सरकार ने बहुत शानदार हलफ़नामा दायर किया था कि भारत में परिवार नियोजन के लिए किसी भी बलपूर्वक तरीक़े की ज़रूरत नहीं है. भारत में ये अधिकार का मुद्दा है और परिवार नियोजन के लिए एक राइट्स बेस्ड अप्रोच ही बेहतर है. कमीशन ने सुझाव देने का मौक़ा दिया है तो हम उसका स्वागत करते हैं और अपने सुझाव देंगे, हम डेटा भी देंगे, सबूत भी देंगे कि इस तरह के कानून की ज़रूरत नहीं है और उम्मीद करते हैं कि सरकार एक ऐसी नीति बनाये जो महिलाओं को ध्यान में रखेगी और उनके अपने शरीर पर अधिकार का सम्मान करेगी.”
साथ ही इस मुद्दे पर विपक्ष राजनीतिक पार्टीयों का मानना है कि यह कदम राज्य सरकार के द्वारा आगामी चुनाव को ध्याम में रखते हुए उठाया गया है। समाजवादी पार्टी के नेता अनुराग भदौरिया ने कहा कि “बढ़ती जनसंख्या देश के लिए समस्या है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन बीजेपी की सरकार ने अब तक कुछ नहीं किया. अब चुनाव आ गया है तो असल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए मार्केटिंग इवेंट किया जा रहा है.”
बहरहाल देश की राजनीति के चुनावी इतिहास को देखते हुए यह कहना मुश्किल नहीं होगा कि सत्ताधारी पार्टी अपने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए ऐसे मुद्दे चुनाव के मुहाने पर लेती रहती है। बात जब दो बच्चों की नीति के नतीजे कि है तो बता दें कि हाल में ही चीन ने अपनी दो बच्चों वाली पॉलिसी को खत्म कर दी। चीन के इस कदम का कारण है देश की जनसंख्या में लगातार गिरावट। इसके साथ-साथ इस नीति के अन्य दुष्परिणामों में लिंग अनुपात में अंतर, शहरी और ग्रामीण लोगों के बीच असमानता और ग्रामीणों पर रोजगार और गरीबी का दबाव बढना आदि भी शामिल है। बात जब भारत जैसे देश की हो जो मौजुदा वक्त में आर्थिक और सामाजिक समस्या से जुझ रहा हो। वहां दो बच्चों वाली नीति को सरकारी ताकत से लागू करना कितना सही कदम होगा। ये भविष्य के गर्भ में है।

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